Category: Poem

अनिकेतन…

डॉ. आशीष श्रीवास्तव की कलम से… हम जो भटके दर दर, अब क्या खाक बनाएंगे घर, मैंने देखा सदन बने है लोगों का अपनापन लेकर, हम क्यों सने व्यर्थ ईंट…

बेजुबान दर्द

जितेन्द्र की कलम से… धन दौलत की चाह नहीं थी किंतु भूख अकुलाई थी, क्षुधा मिटाने की खातिर अपने बच्चे संग आई थी उसे आस थी मानुष पर जो भोजन…

हालात…

सभी देश फूले बैठे थे अपने-अपने परमाणु पर, पर सब के हालात दिख गये एक छोटे से विषाणु पर, बद से बदतर हाल हुआ है बनी है सबकी जान पर, कब किसकी…

जिन्दगी

मुश्किलो में बहक जाना आसान होता है हर पहलू जिंदगी का इम्तिहान होता है डरने वाले को यहाँ कुछ नहीं मिलता और लड़ने वाले के कदमों में जहान होता है