Author: Jitendra Srivastava

बेजुबान दर्द

जितेन्द्र की कलम से… धन दौलत की चाह नहीं थी किंतु भूख अकुलाई थी, क्षुधा मिटाने की खातिर अपने बच्चे संग आई थी उसे आस थी मानुष पर जो भोजन…

हालात…

सभी देश फूले बैठे थे अपने-अपने परमाणु पर, पर सब के हालात दिख गये एक छोटे से विषाणु पर, बद से बदतर हाल हुआ है बनी है सबकी जान पर, कब किसकी…

जिन्दगी

मुश्किलो में बहक जाना आसान होता है हर पहलू जिंदगी का इम्तिहान होता है डरने वाले को यहाँ कुछ नहीं मिलता और लड़ने वाले के कदमों में जहान होता है

याद…

दिन ढल चुका है शाम जा रही है यह रात भी देखो हम पर हंसे जा रही है हर वक्त तन्हाई खामोशी सता रही है कहना सिर्फ यही है –“आपकी…