सभी देश फूले बैठे थे अपने-अपने परमाणु पर, पर सब के हालात दिख गये एक छोटे से विषाणु पर,

बद से बदतर हाल हुआ है बनी है सबकी जान पर, कब किसकी क्या बात करूं सब देशों के ईमान पर,

रुका देश है रुका विश्व है लाकडाउन की धार पर, त्राहि कर रहे प्रवासी सब क्वारेन्टीन की मार पर,

घर वापस आने की विपदा झलक रही है सड़कों पर, भूख प्यास से तड़प रही है सारी जनता सड़कों पर,

सरकारों की अर्थव्यवस्था नाकाफी है भीड़ पर, साइकिल पैदल रिक्शा लेकर देश खड़ा है रोड पर, 

श्रमवीर सब अपने घर को चले जा रहे रोड पर, लाचारी बेबसी भूख ने प्रवासी मजदूरों पर, 

ऐसी विपदा खड़ी हो गई है लाखों परिवारों पर, है विश्वास अटल उन सबको अपने घर की मिट्टी पर, 

भूखो मरना है तो मरेंगे अपनी अपनी धरती पर, कष्ट बहुत है फिर भी है विश्वास हमें सरकार पर, 

साथ चलेंगे साथ लड़ेंगे कोरोना की मार पर, जाति धर्म भाषा और बोली सभी साथ इस बात पर, 

कोरोना हारेगा भारत जीतेगा बन विश्व गुरु संसार पर, 

जितेंद्र की कलम से…

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