मज़दूर नहीं मज़बूर

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हम लोग खुश थे कि कोरोना नामक बीमारी सिर्फ चीन वालों के यहाँ फैली है, हमको तो बस इतना करना है की कोई भारत के बाहर से आये तो बस उनसे दूरी बनानी है वैसे सरकार उसको एयरपोर्ट पर ही चेक कर रही है और क्वारंटाइन में रख रही है लेकिन अचानक एक दिन माननीय प्रधानमंत्री जी ने रात को आठ बजे आकर कहा की मुझे आपका साथ चाहिए जनता कर्फ्यू लगाने में हम भी एकदम से तैयार की कल हम घर में बैठ कर देश के लिए कुछ करेंगे और सोने पर सुहागा ये हो गया की शाम को पांच बजे थाली, ताली इत्यादि भी बजाना है. ये तो एकदम मजे वाली बात हो गयी. मेरे भी मन में ये विचार आया की कल मतलब एकदम पक्का वाला रविवार रहेगा यहाँ तक की कोई फ़ोन भी नहीं आएगा और किसी काम से बाज़ार भी नहीं जाना पड़ेगा। इतना सब सोच ही रहा था की तब तक सोशल मीडिया पर एक खबर दिखाई दी की 14 घंटे का कर्फ्यू इसलिए लगाया गया है की कोरोना वायरस का लाइफ साइकिल 12 घंटे का ही है तो और रात को नौ बजे जब जनता कर्फ्यू ख़त्म होगा तो रात हो जाएगी इसलिए काफी कम लोग लगभग न के बराबर ही बहार निकलेंगे तो कोरोना भारत से ख़त्म हो जायेगा, मतलब ये सुनने के बाद तो मैंने बिस्तर से नीचे न उतरने का निर्णय ले लिया की एकदम जड़ से ख़तम करना है इस बीमारी को भारत से. खैर बहुत सफल भी हुआ जनता कर्फ्यू लेकिन उसके दो दिन बाद पता चला की ये तो रिहर्सल था आगे लम्बी लड़ाई बाकि थी और हिंदुस्तान को बहुत कुछ देखना बाकी था जैसे की भूख, बेरोजगारी, सड़क पर तड़पती जिंदगियां, दूध के लिए बिलबिलाते हुए छोटे नौनिहाल और इससे भी भयावह बहुत कुछ. तीन हफ़्तों का तालाबंदी सुन कर पूरे भारत में हलचल मच गयी, रात में ही आधे से ज्यादा भारत दुकानों के सामने भीड़ लगा कर खड़ा हो गया, ये थी पहली प्रतिक्रिया। दूसरी प्रतिक्रिया आयी दूसरे दिन जब हजारों की संख्या में अप्रवासी जनता जो अपने रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में रहती थी निकल कर सड़क पर आ गयी और बस स्टेशन, रेलवे स्टेशन पर एक भयावह नजारा देखने को मिला। इसके अलावा जिसके पास खुद का साधन था चाहे वो कार हो, मोटर साइकिल हो या साइकिल हो उससे निकल गए अपने गांवअपने शहर अपने घर. मेरे भी मन ये विचार आया की, “अब क्या होगाइक्कीस दिन कौन सी कंपनी, कौन सा मालिक इतना दिन घर में बिठा कर पैसा देगा।

मुझे चिंता होने लगी थी की आज कल एक दिन की भी छुट्टी मिलना भी मुश्किल होती है, आधे समय के लिए भी निकलने के लिए सौ बार सोचना पड़ता है तो ऐसी स्थिति में इक्कीस दिन का बंदी? मन में एक अनजाना सा डर बैठ गया कि क्या तनख्वाह मिलेगी? पूरी मिलेगी या कट कर मिलेगी? नौकरी रहेगी या जाएगी? ऐसे बहुत से सारे सवाल मन में घर कर गए. खैर इसी उधेड़बुन में पहला तालाबंदी निकला, दूसरा निकला और अब तीसरा भी अपने अंतिम चरण में है. पहले चरण में लोगों ने सोचा की चलो कुछ दिन की बात है निकाल लेंगे किसी तरह लेकिन आज लगभग दो महीने पूरे होने वाले हैं और आगे कब तक ऐसे रहना है पता नहीं इस बात को लेकर लोग अवसाद का शिकार हो गए हैं.

लोगों की जमा पूंजी खत्म हो गयी, जहाँ काम करते थे वहां से पैसे मिलना बंद हो गए, मकान मालिक परेशान करने लगे, खाने के लाले पड़ गए. अब गरीब मजदूरों को लगने लगा की अब हम जिन्दा नहीं बचेंगे अगर यहाँ रहे तो भूख से मर जायेगे और बाहर निकले तो कोरोना हमको नहीं छोड़ेगा। आगे कुआँ पीछे खाई.

कहीं ना कहीं इन मजदूरों को अपनी मिट्टी और अपने गावँ पर शहरों से ज्यादा विश्वास था और वो जानते थे की अपनी मिट्टी मे इतना तो पैदा कर ही लेंगे की अपना और अपने बच्चों का पेट भर सकें अपने गावँ और कस्बे के लोग ज्यादा अच्छे हैं जो भूखे नही मरने देंगें, और अगर मरना ही है तो अपने लोगों के बीच में जाकर मरेंगे, अगर बच गए तो दूसरा जन्म हुआ है समझ लेंगे.

सरकारों द्वारा भी काफी व्यवस्था किया गया अप्रवासी लोगों को अपने घर पहुंचाने का लेकिन नाकाफी रहा. जितने लोग घर जाना चाहते थे उसके सामने इंतज़ाम बहुत छोटे पड़ गए. डरे सहमे लोग जहाँ थे वहां से पैदल ही अपने परिवार के साथ अपने छोटेछोटे बच्चों के साथ निकल गए. 1000-1500 km से लेकर 2000 km तक का सफर पैदल तय करना है ये सोचना ही काफी मुश्किल काम है, मैं तो सोच भी नहीं सकता।

लेकिन क्या ये मजदूर इतने मजबूर थे की इनको 1-2 महीने का सहारा नहीं मिल सकता था. जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी निकल दी आपको सेठ बनाने में, मालिक बनाने में वो आज इतने बोझ बन गए की एक महीना नहीं रख पाए लोग उन्हें। बिना पैसे के, भूखे प्यासे, परिवार के साथ इतना दूर जाना वो भी पैदल ये कोई भी शौक से नहीं करेगा। शर्मिंदगी वाली बात ये है की कोई उनको रोक नहीं पाया। उनका ये डर कोई नहीं निकल पाया। की जहाँ हो वही रुको कुछ नहीं होगा, भूखे नहीं रहोगे, कोई मकानमालिक घर से नहीं निकालेगा। ऐसे सब बात तो सरकार की तरफ से बहुत हुए लेकिन जमीनी स्तर पर अमल नहीं हो पाए.

और भयावह स्थिति तो अब शुरू हुई जब निकलने वाले बहुत सारे मजदूर रास्ते में ही बीमारी का शिकार हो गए, कुछ भूख प्यास से मर गए, कुछ पैदल चलने वालों को रास्ते में किसी वाहन ने कुचल दिया, कुछ की क्वारंटाइन सेंटर में किसी असामयिक दुर्घटना से मृत्यु हो गयी और बहुत सारे की रास्ते में दुर्घटना से असामयिक मृत्यु हुई. क्या इतनी सस्ती जिंदगी है गरीबों की? माना की वो इसके खुद जिम्मेदार हैं लेकिन ऐसा करने को कैसे मजबूर हुए? मैंने तो यहाँ तक सुना है की जहाँ जिस राज्य में उनका खुद का घर है जहाँ पैदा हुए वहां की सरकारें उनको वापस नहीं आने देना चाहती और जहाँ हैं वहां की सरकारें चाहती है की वो वहां से चले जाये जिससे उनका आंकड़ा न बढे. आखिर अपने ही देश में ऐसा सौतेला व्यव्हार क्यों? संवेदना मर गयी है सबकी शायद.

इतनी बड़ीबड़ी कंपनियां जिनका टर्नओवर भी शायद मैं न लिख सकू शायद कुछ जीरो आगे पीछे हो जायेगा वो जब एक महीने में दम तोड़ गए तो ये बेचारे दिहाड़ी मजदूरों से कैसे उम्मीद की ये एक महीना या दो महीना बैठ कर खा लेंगे।

राजनीति के कारण हिंदुस्तान का धर्म के आधार पर दो फाड् हो गया था लेकिन इस वैश्विक महामारी के दौरान सभी धर्म के लोग एक साथ आये और एक दूसरे की सहायता की ये एक अच्छी बात देखने को मिली वरना सोशल मीडिया देख देख कर तो एक दूसरे के कट्टर दुश्मन भी हो गए थे.

वैसे सरकार का ये कथन की आत्मनिर्भर बनिए, इसका मैं पूर्ण रूप से समर्थन करता हूँ क्यों की अभी पता नहीं कितने दिनों तक हमको इस कोरोना नामक महामारी के साथ ही रहना है और आगे ऐसी दरबदर भटकने वाली हालत न हो इसलिए खुद कुछ करना चाहिए जीवन यापन के लिए.

आज मजदूरों की हालत देख कर मन बहुत खट्टा है एकदम अंदर से अंतरात्मा झगझोर गयी है. बस भगवान् से यही प्रार्थना है की जल्दी से इन गरीबों की हालत में सुधार हो इनको इनका सम्मान मिले और ये खुद इतना सक्षम हो सके की इनको इनके ही घर में जाने के लिए राज्य सरकार का मुँह न देखना पड़े.

3 thoughts on “मज़दूर नहीं मज़बूर”

  1. Jitendra Srivastava

    बहुत जबरदस्त लेख मन द्रवित हो गया।

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