Bhangarh Fort: The most huanted fort in India:

बहुत साल पहले मैंने कहीं “भानगढ़ किले” के बारे में पढ़ा था. असल में मैं ऐसे जगहों पर जहाँ थोड़ा खतरा हो, रोमांच से भरपूर हो वहां जाना, उनके बारें में जानना, उनको एकदम करीब से अनुभव करना अच्छा लगता है और मेरी आदत में शुमार है. तो उसी समय मैंने तय कर लिया था कि यहाँ जल्दी से जल्दी जाना चाहिए और ऐसी जगह जो भूतों के लिए के लिए मशहूर है जिसके लिए बचपन से ही जिज्ञासा बनी हुई है और अभी तक दुर्भाग्य-वश सामना नहीं हुआ कभी, तो उत्सुकता और बढ़ गयी. खैर काफी समय तक किसी कारणवश जाने का कार्यक्रम नहीं बन पाया लेकिन भानगढ़ किले के बारें में जानकारी इकठ्ठा करता रहा मैं.

फिर इंतज़ार की घड़ियाँ खत्म हुई और लगभग आज से 4 साल पहले 2016 में पहली बार भानगढ़ किला जाने का कार्यक्रम अचानक बन गया. शायद रविवार का दिन था हम लोग कहीं बाहर घूमने जाने का सोच रहे थे गाड़ी लेकर बाहर निकल गए लेकिन समझ में नहीं आ रहा था की कहाँ जाये और दोपहर के बाद का समय था अचानक मेरे मन में विचार आया क्यों न भानगढ़ चला जाये दूरी लगभग लगभग 200 km से थोड़ा सा ज्यादा और रास्ता भी ख़राब लेकिन साथ में परिवार के सदस्यों ने मेरे ड्राइविंग के हुनर को प्रोत्साहित किया तो मैंने तुरंत जोश में आके कूच कर भानगढ़ की तरफ. 

मन में ये बात भी थी की देर हो गया है 5 बजे से से पहले पहुँचना है इसलिए रफ़्तार भी थोड़ी ज्यादा ही रखी. खैर पहुँचे हम लोग किले के दरवाजे पर भानगढ़ किले का दरवाजा देखते ही मन रहस्य और रोमांच से भर गया क्या होगा इसके अंदर? कैसा होगा? क्या सच में कुछ है यहाँ? क्या हमारा सामना किसी ऐसे से होने वाला है जिसका इस दुनिया से कोई ताल्लुक नहीं है वर्तमान समय में. मेरा मकसद ये भी था की यहाँ अँधेरा होने तक रुकना है ताकि अगर कोई है यहाँ तो मुलाकात करके ही जाऊ वो बात अलग है कि साथ में जो लोग थे उनको डर भी लग रहा था लेकिन मेरा साथ देने के लिए मेरे साथ चल रहे थे. सच कहु तो अगर आप भानगढ़ को अपने दिमाग में रख कर वहां जाते हैं तो अरावली की पहाड़ियां और उनके बीच बनी सड़क रास्ते से ही भानगढ़ का एह्सास करवाने लगती है. शांति बहुत महसूस हो रही थी यहाँ और यही शांति “भानगढ़” को “भानगढ़” बना रही थी.  अभी तक लोगों से यही सुना था और पढ़ा था की सूरज ढलने के साथ यहाँ “आत्मायें” जाग जाती हैं. लोगों की माने तो यहाँ से रात में किसी के रोने और चिल्लाने की तेज आवाजें आते हैं. कई बार यहाँ एक साये को भी भटकते हुए देखने की बात कही गई है.

अगर कहानियों की माने तो रात में महिलाओं के रोने, चीखने की आवाजें, उनकी चूड़ियों की खनखनाहट मुझे आकर्षित कर रही थी लेकिन काफी विचरण करने के बाद भी अभी तक कोई मुख़ातिब नहीं हुआ या हुई.

भानगढ़ तीन ओर पहाड़ियों से घिरा हुआ है और भानगढ़ दुर्ग अब पूरा खंडहर बन चुका है सिवाय मंदिरो के. भानगढ़ किले के अंदर काफी सारे मंदिर हैं उनमे से मंगला देवी का मंदिर, सोमेश्वर का मंदिर, गोपीनाथ का मंदिर, केशव राय का मंदिर का मंदिर है. यहाँ स्थित मंदिरों की दीवारों और खंभों की नक्काशी बेहतरीन है, जो इन्हें भव्य और दर्शनीय बनाती है. प्राचीर के मुख्य भाग में हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित है.

पूरा दुर्ग जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है जो इसकी भयावस्था में चार चाँद लगाता है, हालाँकि पुरातत्त्व-विभाग ने भी इस दुर्ग असामान्य बताया है और सूर्योदय के पहले और सूर्यास्त के बाद इसमें जाना प्रतिबंधित है.

काफी समय तक अंदर रहा मैं, किले के एक-एक हिस्से में मैं गया मंदिरों में दर्शन किया, पहड़ियों की तरफ भी अँधेरे में गया, किले के ऊपर जो भी लगभग खँडहर हो गया है उसके ऊपर भी गया “कुछ” तलाश थी लेकिन फिर कहूँगा की दुर्भाग्य-वश “कुछ” नहीं मिला। मेरा मन था रात तक रुकने का या कुछ और घंटे यहाँ रुक सकू तो शायद कुछ दिखे या या सामना हो लेकिन वहां के प्रशाशन से इज़ाज़त नहीं मिली और ह्रदय में उसी रहस्य और रोमांच को संजोये हुए हम लोग वहां से बाहर आ गए.

अब आपको थोड़ा भानगढ़ दुर्ग” के बारें में बता देता हूँ जैसे की इसका इतिहास क्या है और ये क्यों इतना रहस्यमयी है

भानगढ़, राजस्थान राज्य के अलवर जिले में सरिस्का टाइगर रिज़र्व के एक छोर पर बसा हुआ है.  ऐसा माना जाता है कि भानगढ़ किले का निर्माण आमेर के महाराजा भगवंतदास ने करवाया था 17वीं शताब्दी में. उनके मृत्यु के पश्चात् उनके पुत्र माधो सिंह ने भानगढ़ को अपना किला घोषित किया। माधो सिंह के मृत्यु के पश्चात् उनके पुत्र छत्र सिंह को मिला किले का अधिकार। और छत्र सिंह का पुत्र था अजब सिंह। अजब सिंह ने पास में ही “अजबगढ़” बसाया। छत्र सिंह के तीन पुत्रों में से दो अजब गढ़ में रहे लेकिन तीसरा पुत्र हरी सिंह भानगढ़ का शासक बना. हरी सिंह के मृत्यु के पश्चात् इनके दो पुत्र भानगढ़ के शाशक बने और इनसे राजा सवाई जय सिंह ने कब्ज़ा कर लिया।

भानगढ़ के खँडहर होने की कहानी:

इस बारें में दो कहानियां प्रचलित हैं;

1. राजकुमारी रत्नावति और तांत्रिक सिंधु सेवड़ा की कहानी

भानगढ़ की राजकुमारी रत्नावती बहुत खूबसूरत थी उनके खूबसूरती के चर्चे बहुत दूर-दूर तक चर्चित थे. बहुत से राज्यों के राजकुमार,राजकुमारी रत्नावती से विवाह करने के इच्छुक थे.

लेकिन उसी राज्य में एक तांत्रिक था “सिंधु सेवड़ा” जो काले जादू का ज्ञाता था और राजकुमारी रत्नावती पर मोहित था और उनको किसी भी तरह उनको हासिल करना चाहता था.

राजकुमारी रत्नावती का श्रृंगार का सामान जहाँ से जाता था किले में, उसका पता उस तांत्रिक ने लगा लिया और एक बार एक इत्र में अपने काले जादू के प्रभाव से उसमें वशीकरण मन्त्र मार दिया जिससे जो उसका प्रयोग करेगा वो उसकी तरफ खिंचा चला जायेगा। लेकिन उसके इस काले कारनामे का राजकुमारी को पता चल गया और राजकुमारी ने वो इत्र की शीशी को पास पड़े चट्टान (पत्थर) पर पटक दिया जिससे वो पत्थर उस तांत्रिक की तंत्र विद्या के प्रभाव के कारण उसकी तरफ तीव्र गति से जाने लगा जिससे उस तांत्रिक को लग गया की उसकी मृत्यु निश्चित है तो उसने श्राप दिया कि भानगढ़ बर्बाद हो जायेगा. वहाँ के निवासियों की शीघ्र मौत हो जायेगी और उनकी आत्माएं सदा भानगढ़ में भटकती रहेंगी. वह चट्टान के नीचे दबकर मर गया. इस घटना के कुछ दिन बाद भानगढ़ और अजबगढ़ में भयंकर युद्ध हुआ और इस युद्ध में भानगढ़ पूरा तबाह हो गया और राजकुमारी रत्नावती भी इसमें मारी गयी. इसके बाद भानगढ़ दुर्ग को कभी बसाया ना जा सका.

2. बालूनाथ के श्राप की कहानी

इस कहानी के अनुसार जहाँ भानगढ़ किले का निर्माण हुआ वहां योगी बालूनाथ का तपस्थल थाऔर योगी बालूनाथ ने इस शर्त पर इस किले के निर्माण को अनुमति दी थी राजा भगवंत दास को की किले की परछाई कभी उनके तपस्थल पर न पड़ेभगवंतदास ने तो इसका मान रखा लेकिन माधो सिंह ने इस बात का मान नहीं रखा और ऊपर के हिस्सों का निर्माण करवाने लगे जिससे योगी बालूनाथ के तपस्थल पर परछाईं आने लगी और इसके क्रोधित होकर योगी ने श्राप दे दिया और ये पूरा क़िला ध्वस्त हो गया और फिर कभी नहीं बसा.

भानगढ़ कैसे जाया जाए:

भानगढ़ जाने के लिए सबसे पास का Airport जयपुर है. सबसे पास का रेल्वे स्टेशन दौसा है. आप जयपुर या दिल्ली से बस या टैक्सी के द्वारा जा सकते हैं. भानगढ़ दिल्ली से लगभग 285 km, जयपुर से लगभग 83 km और आगरा से लगभग 210 km है.

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