डॉ. आशीष श्रीवास्तव की कलम से...

हम जो भटके दर दर,

अब क्या खाक बनाएंगे घर,

मैंने देखा सदन बने है लोगों का अपनापन लेकर,

हम क्यों सने व्यर्थ ईंट गारे में,

हम अनिकेतन अनिकेतन अनिकेतन…

By Anurag

One thought on “अनिकेतन…”

Comments are closed.